उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को राजस्थान उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें एक दम्पति को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। यह मामला एक सिविल विवाद था जिसे बाद में आपराधिक रंग दे दिया गया।न्यायमूर्ति जे।बी। पारदीवाला , जो न्यायमूर्ति आर। महादेवन के साथ पीठ साझा कर रहे थे , ने टिप्पणी की कि वह “बहुत नियंत्रणकारी” थे और इस बार वे इस पर हंसेंगे।
“आज हम अपना आपा नहीं खोएँगे। आज हम पूरी तरह नियंत्रण में हैं। इसका इलाज है हँसना,” उन्होंने केस फाइल पढ़ते हुए ठहाके लगाकर हँसने से पहले कहा। न्यायमूर्ति पारदीवाला की यह प्रतिक्रिया हाल ही में उनके और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार के बीच हुए विवाद की पृष्ठभूमि में आई है ।
दरअसल आजकल दीवानी मामलों की सुनवाई में अतिशय अदालती देरी के चलते दीवानी मामलों को आपराधिक रंग देने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है, ताकि मन मुताबिक समझौते की संभावना बन सके। यही नहीं सुविधा शुल्क वसूली के लिए दीवानी मामलों को अपराधिक रंग देने की प्रवृत्ति में पुलिस की भी मिलीभगत बढती जा रही है। दीवानी मामलों को अदालत के बाहर निपटने में जहाँ अपराधियों/दबंगों की कंगारू अदालतें बनती जा रही है वहीं पुलिस भी सुविधा शुल्क वसूली के लिए इसमें कूद पड़ी है ।ऐसे में उच्चतम न्यायालय का एक महत्वपूर्ण फैसला आया है, जिसमें कहा गया है कि दीवानी मामले को आपराधिक प्रकृति का बताने की कोशिश करना अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
इस महीने की शुरुआत में गया।न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला, जो न्यायमूर्ति आर। महादेवन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की सूची से आपराधिक मामलों को हटाने का आदेश दिया था, क्योंकि उन्हें पता चला था कि उन्होंने एक विशुद्ध रूप से सिविल विवाद में आपराधिक अभियोजन जारी रखने की अनुमति दी थी।न्यायमूर्ति पारदीवाला ने बाद में भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई के अनुरोध पर उन निर्देशों को वापस ले लिया, तथा स्पष्ट किया कि उनका इरादा न्यायाधीश को शर्मिंदा करने का नहीं था तथा उन्होंने स्वीकार किया कि रोस्टर आवंटन उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का विशेषाधिकार है।
आज, पीठ एक दंपति की उस अपील पर सुनवाई कर रही थी जिसमें उन्होंने प्लाइवुड की एक खेप के लिए कथित तौर पर बकाया राशि के मामले में अग्रिम ज़मानत देने से उच्च न्यायालय के इनकार के खिलाफ अपील दायर की थी। शिकायत में दावा किया गया था कि ₹3.5 लाख का भुगतान किया जा चुका है, लेकिन शेष ₹12.5 लाख का भुगतान नहीं किया गया है। दंपति के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी), 406 (आपराधिक विश्वासघात) और 120बी (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है।
पीठ ने दर्ज किया कि प्राथमिकी को साधारण रूप से पढ़ने पर भी, एकमात्र संभावित आरोप धोखाधड़ी का ही था। पीठ ने आगे कहा कि एक बार बिक्री लेनदेन हो जाने के बाद आपराधिक विश्वासघात का अपराध नहीं बनता।”यह स्पष्ट है कि उच्च न्यायालय के समक्ष एकमात्र तर्क यह हो सकता है कि यह एक दीवानी विवाद का मामला है। एक बार बिक्री लेनदेन हो जाने के बाद, आपराधिक विश्वासघात का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यह कानून की एक स्थापित स्थिति है,” न्यायालय ने कहा।
न्यायाधीशों ने उच्च न्यायालय के आदेश के तर्क पर, खासकर उस हिस्से पर निराशा व्यक्त की जिसमें सरकारी वकील ने कहा था कि ₹12.5 लाख की राशि की वसूली नहीं हो सकी क्योंकि अभियुक्तों को गिरफ्तारी से संरक्षण प्राप्त था। इस हिस्से को पढ़ते हुए न्यायमूर्ति पारदीवाला फिर से हँस पड़े।
उन्होंने आदेश में कहा, “हमने जो समझा है, वह यह है कि राज्य के अनुसार, शेष राशि की वसूली के लिए पुलिस तंत्र की आवश्यकता है। हमें इस मामले में और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। आमतौर पर, हम उच्च न्यायालय द्वारा जमानत देने से इनकार करने के आदेश को रद्द नहीं करते। लेकिन यह एक ऐसा आदेश है जिसे हम रद्द करना उचित समझते हैं। “
आदेश लिखवाने के बाद, राज्य के वकील ने स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय के समक्ष उनका एकमात्र तर्क यह था कि अपीलकर्ता फरार हो गए थे। न्यायमूर्ति पारदीवाला ने जवाब दिया कि अनुपस्थिति भय के कारण हो सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई अपराध हुआ है।”सिर्फ़ इसलिए कि उसे उस विक्रेता को कुछ पैसे देने थे, क्या पुलिस आकर हमें उठा ले जाएगी? इस मामले में तुम्हें पुलिस की सेवाओं की क्या ज़रूरत है?”
सुनवाई के अंत में न्यायाधीश ने आपराधिक प्रक्रिया के दुरुपयोग पर खेद व्यक्त करते हुए कहा,”अगर हाई कोर्ट ने थोड़ा दिमाग लगाया होता, तो हमें इस अनावश्यक मुकदमेबाजी से परेशानी नहीं होती। पक्षकार को सुप्रीम कोर्ट आना पड़ा, वकील रखने के लिए पैसे खर्च करने पड़े, हमें मामला पढ़ना पड़ा, हमें आदेश लिखवाना पड़ा और ऐसे कई आदेश हो सकते हैं। क्या हमें इस अनावश्यक मुकदमेबाजी से बचना चाहिए?”
पहले के मामले में, न्यायमूर्ति पारदीवाला ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के तर्क को “अस्थिर” बताया था और दोहराया था कि सिविल और आपराधिक उपचार समानांतर रूप से तभी चल सकते हैं जब आपराधिक अपराध के तत्व स्पष्ट हो जाएं।
उन्होंने आदेश में कहा, “न्यायाधीश ने यहां तक कहा है कि शिकायतकर्ता को सिविल उपाय अपनाने के लिए कहना बहुत अनुचित होगा क्योंकि सिविल मुकदमों में लंबा समय लगता है, इसलिए शिकायतकर्ता को वसूली के लिए आपराधिक कार्यवाही शुरू करने की अनुमति दी जा सकती है… संबंधित न्यायाधीश ने न केवल खुद को एक दयनीय स्थिति में डाला है, बल्कि न्याय का भी मजाक उड़ाया है। हम यह समझने में असमर्थ हैं कि उच्च न्यायालय के स्तर पर भारतीय न्यायपालिका में क्या गड़बड़ है। कई बार हम यह सोचकर हैरान रह जाते हैं कि क्या ऐसे आदेश किसी बाहरी विचार पर पारित किए जाते हैं या यह कानून की सरासर अज्ञानता है। आज का मामला भी इसी बात पर केंद्रित था – लेकिन इस बार न्यायाधीश ने अपना आपा खोने के बजाय हंसना पसंद किया।
दीवानी मामलों को आपराधिक बनाने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
धारा 482 के तहत हाईकोर्ट यह जाँच कर सकता है कि दीवानी मामले को आपराधिक रंग तो नहीं दिया जा रहा है… आजकल दीवानी मामलों की सुनवाई में अतिशय अदालती देरी के चलते दीवानी मामलों को आपराधिक रंग देने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है, ताकि मन मुताबिक समझौते की संभावना बन सके। यही नहीं सुविधा शुल्क वसूली के लिए दीवानी मामलों को अपराधिक रंग देने की प्रवृत्ति में पुलिस की भी मिलीभगत बढती जा रही है। दीवानी मामलों को अदालत के बाहर निपटने में जहाँ अपराधियों/दबंगों की कंगारू अदालतें बनती जा रही है वहीं पुलिस भी सुविधा शुल्क वसूली के लिए इसमें कूद पड़ी है ।ऐसे में उच्चतम न्यायालय का एक महत्वपूर्ण फैसला आया है, जिसमें कहा गया है कि दीवानी मामले को आपराधिक प्रकृति का बताने की कोशिश करना अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दिया है कि कि सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए हाईकोर्ट इस बात की पड़ताल कर सकता है कि जो मामला दीवानी प्रकृति का है उसे आपराधिक मामला तो नहीं बनाया जा रहा है। न्यायालय ने कहा कि अगर किसी मामले को दीवानी है पर उसे आपराधिक मामला बनाया गया है तो इस मामले का जारी रहना न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और इस मामले को निरस्त किया जा सकता है। यह व्यवस्था न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की पीठ ने प्रो आर के विजय सारथी बनाम सुधा सीताराम एवं अन्य, विशेष अनुमति याचिका (क्रिमिनल) 1434 / 2018,मामले में दिया था ।
इस मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों को निरस्त करने के आरोपियों की अपील को सुनने से मना कर दिया था । मामले के तथ्यों के अनुसार यह विवाद दो परिवारों के बीच था । शिकायतकर्ता की बेटी आरोपी के बेटे की पत्नी है। बेटी की तलाक़ की अर्ज़ी पारिवारिक अदालत ने ख़ारिज कर दी। आरोपी के बेटे ने 17 फ़रवरी 2010 को अपनी सास के खाते में 20 लाख रुपए डाल दिए। बाद में जब दोनों के बीच वैवाहिक संबंध टूट गए तो उसने इस राशि की वापसी के लिए अपनी सास के ख़िलाफ़ एक दीवानी मामला दर्ज कर दिया।
इसके बाद सास ने कहा कि यह राशि बाद में उसने अपने माँ-बाप को नक़द दी और उन लोगों ने इसकी कोई प्राप्ति रसीद उन्हें नहीं दी। सास ने आरोप लगाया कि आरोपी (उनकी बेटी का पति) और उसके माँ-बाप ने मिली भगत से इस पैसे को निकाल लिया है और जो दीवानी मामला दायर किया गया है, उसमें कोई दम नहीं है। मामले में मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद आईपीसी की धारा 405, 406, 415 और 420 (धारा 34 के साथ) एफआईआर दर्ज किया गया। हाईकोर्ट ने इस एफआईआर को निरस्त करने से मना कर दिया था।
शिकायत की जाँच करते हुए पीठ ने कहा कि इस मामले में शिकायतकर्ता ने दीवानी मामले को आपराधिक प्रकृति का बताने की कोशिश की है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग है और मामले को ख़ारिज किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 482 के तहत मिले अधिकार का प्रयोग सावधानी से करने की ज़रूरत है। इसके तहत अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए हाईकोर्ट इस बात की पड़ताल कर सकता है कि कोई मामला जो कि आवश्यक रूप से दीवानी प्रकृति का है, उसे आपराधिक मामले का रूप तो नहीं दिया गया है। अगर शिकायत को सिर्फ़ पढ़कर ही ऐसा नहीं लगता कि ये तथ्य आपराधिक मामलों से संबंधित हैं, तो इस मामले को जारी रहना अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
गौरतलब है कि अर्थ संबंधी मामले अर्थात जिनमें संपत्ति, क्रय-विक्रय, लेन-देन आदि पर विवाद शामिल हों, दीवानी (सिविल) मामले माने जाते हैं और दीवानी यानि सिविल विधि प्रक्रियाओं और दीवानी (सिविल) अदालतों के द्वारा निपटाएं जाते हैं। उदाहरण के लिए मकान मालिक और किराएदार के बीच किराए पर या मकान खाली करने आदि पर मतभेद के मामले अथवा संपत्ति के स्वामित्व या उत्तराधिकार आदि से जुड़े मामले। वास्तव में वे सभी कानूनी विवाद जो अपराध अथवा फौज़दारी से संबद्ध न हों, उन्हें दीवानी मामले कहा जा सकता है।फौजदारी कानून के अधीन वह सब मामले आते हैं जो आपराधिक कृत्यों से जुड़े हों उदाहरण के लिए हत्या, बलात्कार, धोखाधड़ी, मारपीट, डकैती, चोरी आदि के मामले।दीवानी मामलों के लिए सिविल प्रोसिजर कोड और फौज़दारी मामलों के लिए अपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) है।
सिविल विवादों को आपराधिक मामलों में बदलने की गलत प्रथा कई राज्यों में बड़े पैमाने पर: सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने 16 दिसंबर2024 को कई राज्यों में नागरिक विवादों को आपराधिक मामलों में बदलने के ‘गलत और अनियंत्रित अभ्यास’ पर चिंता व्यक्त की। तत्कालीन चीफ़ जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की खंडपीठ शिकायतकर्ता द्वारा याचिकाकर्ता के खिलाफ दायर धारा 420, 406, 354, 504, 506 आईपीसी के तहत आरोपों को रद्द करने की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसने कुछ संपत्ति के बिक्री विलेख के हस्तांतरण में बेईमानी का आरोप लगाया
याचिकाकर्ता ने यहां इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी, जिसने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत याचिका में लगाए गए आरोपों को रद्द करने से इनकार कर दिया था, प्रथम दृष्ट्या विचार में कहा था कि “इस स्तर पर, यह नहीं कहा जा सकता है कि आवेदकों के खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता है।” जब पीठ ने प्रतिवादी नंबर 2 (मूल शिकायतकर्ता) के वकील से पूछा कि क्या वर्तमान तथ्यों पर कोई दीवानी मुकदमा दायर किया गया है, तो वकील ने जवाब दिया कि केवल एक आपराधिक मामला दायर किया गया था, यह देखते हुए कि याचिकाकर्ता दूसरे आवास में स्थानांतरित हो गया था।
सीजेआई ने मौखिक रूप से सिविल विवादों को गलत तरीके से आपराधिक रंग देने की हालिया प्रवृत्ति के बारे में टिप्पणी की। चीफ़ जस्टिस ने कहा, ‘यह भी उन मामलों में से एक है जहां दीवानी डिफॉल्ट/दीवानी मामले को फौजदारी में बदल दिया गया है और इसकी बहुत सख्ती से जांच की जानी चाहिए।
एक अन्य मामले में8 अप्रैल 25 को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में कानून के शासन की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह पूरी तरह से धाराशायी हो चुका है। अदालत ने एक दीवानी मामले को आपराधिक मामला बनाने पर नाराजगी जताई और यूपी के डीजीपी और गौतमबुद्धनगर के थाना प्रभारी से स्पष्टीकरण मांगा है।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यूपी में कानून का शासन (रूल ऑफ लॉ) पूरी तरह से धाराशायी हो चुका है। शीर्ष अदालत ने सिविल मामले को क्रिमिनल केस बनाए जानें पर यह तल्ख टिप्पणी की। चीफ जस्टिस की अगुआई वाली बेंच ने यूपी डीजीपी और गौतमबुद्धनगर जिले के एक थाना प्रभारी को हलफनामा दाखिल कर बताने को कहा कि सिविल विवाद में आखिर क्यों आपराधिक कानून की प्रक्रिया शुरू की गई? अगली सुनवाई मई में होगी।
चीफ जस्टिस ने संजीव खन्ना ने कहा कि दीवानी (सिविल) मामले में क्रिमिनल केस बनाया जाना स्वीकार्य नहीं है। वकील ने कहा कि क्रिमिनल केस इसलिए बनाया गया, क्योंकि दीवानी विवादों के निपटारे में वक्त लगता है। इस पर शीर्ष अदालत ने कहा, ‘यूपी में यह जो रहा है वह गलत है। हर दीवानी केस को क्रिमिनल केस में बदला जा रहा है। यह असंगत है और पैसे न चुकाया जाना कोई क्रिमिनल अफेंस नहीं बनता है। हम जांच अधिकारी को गवाही के लिए बुलाएंगे। जब हम जांच अधिकारी को तलब करेंगे तो उन्हें कठघरे में खड़े होकर यह साबित करना होगा कि यह कैसे आपराधिक मामला है। चार्जशीट ऐसे दाखिल होती है? जांच अधिकारी को इसके लिए सबक देना जरूरी है।’ कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि यदि यह प्रथा जारी रही तो राज्य पर जुर्माना लगाया जा सकता है।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं।)